खबरे जरा हटके:-खंडहर में कैद एक राजकुमार-एक राजकुमारी

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      नई दिल्‍ली। दिल्‍ली के सरदार पटेल मार्ग स्थित रिज में पहाडी पर स्थित है एक महल, जहां जाने की इजाजत किसी को नहीं है । उस महल तक पहुंचने के एक मात्र रास्‍ते पर लगा है लोहे का ग्रिल, जिस पर हल्की-सी आहट होते ही कई कुत्‍ते भौंकना  शुरु कर देते हैं । चारों ओर कंटीली तार के बाड़े से घिरे उस महल के प्रवेश द्वार पर लगे पत्थर पर लिखा है, ‘रूलर्स ऑफ अवध: ‘प्रिंसेस विलायत महल’…
जी हां, आपको आश्चर्य होगा, लेकिन नवाब वाजिद अली शाह के वंश की आखिरी निशानी अवध के राजकुमार रियाज व राजकुमारी सकीना दशकों से दिल्‍ली के सरदार पटेल मार्ग के रिज एरिया में स्थित मालचा महल में रह रहे हैं। मालचा महल को बिस्‍तदारी महल भी कहा जाता है। यह उनका एक ऐसा द्वीप है, जहां बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं । पास ही स्थित इसरो के केंद्र से उन्‍हें पानी तो मिल जाता है, लेकिन उनके खाने का इंतजाम… आज भी एक रहस्य जैसा ही है…

नवाब वाजिद अली शाह के वंशज हैं रियाज व सकीना
औपनिवेशिक शासक काल का अवध, आज का लखनऊ है । अवध के आखिरी शासक नवाब वाजिद अली शाह काफी रंगीन मिजाज बादशाह थे। उनके हरम में कई रानियां थी, लेकिन उनकी सबसे चहेती रानी का नाम हजरत महल था । वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने 1856 में कलकत्‍ता में नज़रबंद कर दिया था । उस दौरान हजरत महल ने लखनऊ की सत्‍ता पाने की काफी कोशिश की थी । उन्होंने अंग्रेजों को अपने नाबालिग बेटे बिरजिस कदर को गद्दी सौंपने को कहा था । हजरत महल के अनुरोध को अंग्रेजों ने ठुकरा दिया था । बिरजिस के जीवन पर भी खतरा मंडरा रहा था । इसलिए हजरत महल अपने बेटे बिरजिस कदर के साथ छिपते-छिपाते नेपाल भाग गई । बाद में वह कभी हिंदुस्‍तान नहीं लौट सकी । मां-बेटे की मौत नेपाल में ही हो गई । वाजिद अली शाह के अन्‍य बेगम व उनके बच्‍चे बच्चे बच गए थे, जिसमें से एक बेटे की शादी बेगम विलायत महल से हुई थी । रियाज व सकीना इसी विलायत महल के बच्‍चे हैं ।

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विलायत महल, रियाज और सकीना
अपना गुजारा चलाने के लिए विलायत महल के पति सरकारी मुलाजिम बन गए । पति की मौत के बाद विलायत महल ने अंग्रेजों से लखनऊ की रियासत में हिस्‍सेदारी मांगी, लेकिन अंग्रेजों ने उन्‍हें मना कर दिया । सन 1947 में देश आजाद हो गया । आजाद भारत के गृहमंत्री सरदार वल्‍लभ भाई पटेल की कोशिशों से देश की 565 रियासतों का भारत गणराज्‍य में विलय हो गया ।  लेकिन रियासतों के राजा, रानी, नवाब आदि को अंग्रेजी शासन काल की ही तरह पेंशन की सुविधा मिलती रही । बेगम विलायत महल को 500 रुपए प्रति माह पेंशन मिलता था । मालचा महल में रहने वाले राजकुमार रियाज व व राजकुमारी सकीना इसी विलायत महल के बच्चे हैं।

पेंशन खत्‍म होने पर, नई दिल्‍ली स्‍टेशन पर डाला डेरा
जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी तो उन्‍होंने सारे राजे-महाराजे की पेंशन सहित सभी तरह की सुविधाएं समाप्‍त कर दीं । जो राजे-महाराजे शक्तिशाली थे वे राजनीति के मैदान में उतर पड़े और जो कमजोर थे उनकी दशा दयनीय हो गई । विलायत महल के दो छोटे बच्‍चे थे और वह मजबूत भी नहीं थी इसलिए उनके साथ संकट उत्‍पन्‍न हो गया । कोई उपाय न देखकर विलायत महल ने सन 1975 में अपने दोनों बच्‍चे रियाज व सकीना सहित , 12 कुत्‍तों और और पांच नौकरों के साथ लखनऊ से दिल्‍ली की ओर रुख किया और यहां के नई दिल्‍ली रेलवे स्‍टेशन के एक प्‍लेटफॉर्म पर डेरा डाल दिया । बाद में वह अपने कुनबे के साथ प्‍लेटफॉर्म से उठकर वीआईपी वेटिंग लांज पहुंची और वहां कब्‍जा कर लिया।

विलायत महल अपने कुनबे के साथ नई दिल्‍ली रेलवे स्‍टेशन पर करीब नौ वर्ष तक रहीं, जिसमें से लगातार तीन वर्ष धरना देकर अपने अपने अधिकार की मांग करती रहीं । उनके धरने की खबर तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कानों तक पहुंची । जिस वर्ष इंदिरा गांधी की हत्‍या हुई उसी वर्ष इंदिरा गांधी विलायत महल व उनके बच्‍चों के हालात का जायजा लेने नई दिल्‍ली रेलवे स्‍टेशन पहुंची ।  इंदिरा गांधी को देखते ही विलायत महल फट पड़ी । किसी तरह उन्‍हें शांत किया गया । इंदिरा गांधी ने उन्‍हें कहीं और रहने के लिए ठिकाना उपलब्‍ध कराने का वचन दिया । विलायत महल की मांग थी कि उन्हें रहने के लिए ऐसी जगह मुहैया कराई जाए, जहां आम आदमी उनकी जिंदगी में ताक-झांक न कर सके । जगह की तलाश खत्म हुई सरदार पटेल मार्ग स्थित सेंट्रल रिज एरिया में।

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सेंट्रल रिज एरिया में मालचा महल स्थित है, जो ऊंची पहाड़ी पर तो स्थित है ही, जंगल से भी घिरा है ।  यह एक अनजान स्‍मारक है, जहां के बारे में आज भी दिल्‍ली के अधिकांश निवासी नहीं जानते हैं । जानकारी के मुताबिक इंदिरा गांधी की मौत के बाद वर्ष 1985 में उनके बेटे व तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विलायत महल को मालचा महल में रहने के लिए स्‍वीकृति पत्र प्रदान किया था, जिसमें उन्हें नवाब वाजिद अली शाह का वंशज बताया गया था।

मालचा महल में विलायत महल ने की थी आत्‍महत्‍या
करीब 700 वर्ष पुराने लाल-भूरे पत्‍थर से निर्मित मालचा महल को फिरोजशाह तुगलक के शिकारगाह के रूप में जाना जाता है । इस महल में 20 दरवाजे हैं, जिसकी वजह से इसे ‘बिस्‍तदरी महल’  भी कहा जाता है ।  लेकिन इसके एक भी दरवाजे पर किवाड़ नहीं लगा है । 10 सितंबर 1993 में दोपहर 2.40 बजे बेगम विलायत महल ने आत्‍महत्‍यार कर ली थी। कहा जाता है कि वह अपने जीवन के अकेलेपन से ऊब गई थी और अपने हीरे की अंगूठी को तोड़कर खा लिया था, जिससे उनकी मौत हो गई । मां की मौत के बाद से रियाज व सकीना बिल्‍कुल अकेले हैं।

वर्तमान में राजकुमार व राजकुमारी की दुनिया
राजकुमार रियाज व राजकुमारी सकीना की उम्र 50 वर्ष से अधिक है । बाहरी दुनिया से दोनों का कोई संपर्क नहीं है । मालचा महल में न तो बिजली कनेशन है और न ही पानी की पाइप लाइन, लेकिन एमटीएनएल का टेलीफोन कनेक्‍शन उन्होंने जरूर ले रखा है । एमटीएनएल के लाइन मैन महेन्द्र के अनुसार, दोनों की दुनिया बड़ी रहस्यमयी है । फोन खराब हो जाए तो फोन को बाड़े के अंदर से ही सरका देते हैं, लेकिन हमें अंदर नहीं आने देते । उनकी हालत खास्‍ता है । ढंग के कपड़े भी उनके शरीर पर नहीं होता, लेकिन राजकुमार के पास रिवाल्‍वर जरूर है । उसके पास एक टूटी साइकिल भी है । वह खुद के लिए राशन लाने और अपने कुत्‍तों के लिए मीट लाने के लिए लुंगी व शर्ट पहने बाहर निकलता है और किसी द्वारा कुछ पूछने की कोशिश करने पर रिवाल्‍वर तान देता है । गेट पर आहट होते ही उसके कुत्‍ते भौंकने लगते हैं । अब तो कुत्‍ते भी शायद एक या दो ही बचे हैं । राजकुमार रियाज की अंग्रेजी बहुत अच्‍छी है । उसने विदेश से पढ़ाई की है।

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आज भी बरकरार है अकड़
मालचा महल के पास ही अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र(इसरो) का दफ्तर है । इसरो दफ्तर की दीवार के पास और बाड़े के अंदर एक पानी की टंकी लगी है । इसरो से एक पानी की पाइप लाइन निकली है, जो उस टंकी से जुड़ी है । इसरो के एक कर्मचारी ने बताया कि दिन में एक बार टंकी भर देते हैं । राजकुमार बाल्‍टी से उससे पानी निकाल-निकाल कर पानी अंदर ले जाता है। आज भी रियाज की अकड़ पहले वाले राजकुमार की तरह है । वह हिंदी की बजाय फर्राटेदार अंग्रेजी में बात करना पसंद करता है । वह चाहता है कि लोग उससे ‘हुजूर’ कह कर बोलें और अदब से पेश आएं । राजकुमारी भी अकड़ में रहती है, लेकिन वह कभी बाहर नहीं निकलती ।

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